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मजेदार चुदाई का आनंद-1

प्रिय पाठको,

मैंने पिछली कहानी में बताया था कैसे मैं नेहा के साथ एक गेम में हार गया था, जिसके फलस्वरूप मुझे नेहा से उसके स्टाइल में चुदना था। मैं और नेहा एक होटल में रुके थे जहाँ उसके ठरकी जीजा विक्रम ने अपनी पत्नी अनु को अपने सामने ही मुझसे चुदवाया था और फिर मैंने और उसने एक साथ अनु की चूत और गाण्ड मारी थी, पहले उसने गाण्ड ली और मैंने चूत, फिर मैंने गाण्ड मारी और उसने चूत ली।

उस दिन नेहा की तबीयत खराब होने के कारण वो चुदाई समारोह में भाग नहीं ले सकी थी।

अब अगले दिन की गाथा सुनिये। अगले दिन नेहा की तबियत ठीक थी और वो चुदने के लिये बेकरार भी थी।  सुबह नाश्ते के समय मैंने विक्रम से पूछा- क्यों दोस्त आज का क्या प्लान है? कल का अनुभव दोहराना है क्या?

‘हाँ सर… कल का अनुभव शाम को दोहराएँगे एक बार… दिन में आप नेहा की सेवा करिये, वो बेचारी कल से इतनी चुदाई देख देख कर फटने को हो रही होगी… शाम को दोनों मिल कर अनु को चोदेंगे और रात फिर आप और नेहा, मैं और मेरी अनु को… क्या कहना है आप का?

‘ठीक है यह प्रोग्राम, ऐसा ही करते हैं।’ मैंने जवाब दिया। नाश्ता कर के हम अपने अपने कमरों में आ गये।

उससे पहले सुबह उठते ही मैंने नेहा का स्वर्णमृत पी कर उसे बेहद खुश कर दिया था।

मस्ता तो मैं भी बहुत गया था, जी करता था कि अभी मचल अचल कर इस कामुक, कामासक्त और कामातुर लड़की को चोद के रख दूँ।

फिर हम दोनों एक साथ नहाये भी थे लेकिन मैंने चुदाई करने की चेष्टा ही नहीं की क्योंकि आज तो नेहा ने मुझे चोदना था उसके स्टाइल में, उसकी मर्ज़ी के ढंग से!

मैंने नेहा का एक लम्बा और गहरा चुम्बन लेकर पूछा- तो फिर क्या दिमाग में है मेरी प्यारी नेहा के… तूने कहा था तू अपने ही तरीक़े से तीन बार मुझे चोदेगी। क्या स्पेशल स्टाइल है जिससे तू चुदाई आज करेगी?

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मैंने उसे कस के बाहों में जकड़ लिया और उसकी आँखों में देखने लगा।

मुझे बहुत कौतूहल था कि आज मैं कैसे चुदूँगा।

‘सुन निलेश !’ नेहा ने जोश से भरकर कहा- सबसे पहले तू मेरा रेप करेगा… मेरा बड़ा दिल है मेरा बलात्कार हो.. फिर तू मुझे चोदेगा बिल्कुल वैसे जैसे कि आदिमानव या कह लो केवमैन (पुराने समय में गुफाओं में रहने वाले जंगली मानव) अपनी औरतों को चोदा करते थे… और तीसरे मैं तुझे अपना ग़ुलाम बनाकर और मैं खुद तेरी मल्लिका बनके तुझे चोद दूँगी।

मैंने नेहा को कस के बाहों में दबोच लिया और उसके भरे भरे, किसी पके संतरे की फांकों जैसे खूबसूरत होंठ चूसने लगा।

मोटी चूचियाँ निचोड़ लिया

मेरे हाथ नेहा की मोटी चूचियाँ निचोड़ रहे थे। नेहा ने भी मस्ता कर अपनी जीभ मेरे मुँह में घुसा दी और पैंट के ऊपर से ही लण्ड मसलने लगी।

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हम काफी देर तक ऐसे ही लिपट लिपट कर मज़ा लूटते रहे। फिर खड़े हुए लण्ड को संभालता हुआ मैं बोला- …मैंने तो कभी किसी लड़की का रेप किया नहीं है… अब मैं कैसे तुझसे रेप करूगा? मुझे तो पता भी नहीं है कि रेप कैसे करते हैं।
नेहा इठलाकर बोली- निलेश, तुम सारी पिक्चरें देखते हो… हर फिल्म में रेप तो होता ही है हीरो की बहन का… बस तो जैसे फिल्म मे विलेन रेप करते हैं तुम भी वैसे ही कर डालो… सच्ची में निलेश मेरा बड़ा दिल करता है कि कोई साण्ड मुसंड, जैसे कि तुम, मेरा बलात्कार करे… हाय राम… कितना मज़ा आयेगा ना जब तुम अपना लोहे सा सख्त लण्ड मेरी चूत में ज़बरदस्ती ठोक दोगे… मेरी तो सोच सोच के ही मस्ती से गाण्ड फटी जा रही है… जब चुदूँगी तो राम जाने क्या हाल होगा मेरा |

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मैंने कहा- अच्छा ठीक है, कोशिश करता हूँ… देखो बलात्कार करने में और गुफा में रहने वाले जंगली आदमियों की चुदाई में कोई खास फर्क नहीं है। दोनों ही वहशी दरिंदों की तरह व्यवहार करते हैं… तो , तू दोनों कामों को एक ही मान ले… यह समझ ले कि तेरा रेप हुआ तो साथ साथ में जंगलियों जैसी चुदाई भी हो गई… दूसरा जैसे ही मैंने लौड़ा चूत में ठूंस दिया, यह मान लेंगे कि बलात्कार हो गया… एक बार लण्ड बुर में घुस गया तो फिर बलात्कार हो या रज़ामंदी से तू चूत मरवाये एक ही चीज़ है… क्यों ठीक है ना ये दो बातें?

नेहा ने अपनी सुन्दर आँखें टिमटिमाईं, वो कुछ कनफ्यूज़ दिखने लगी मेरी दो बातें सुन कर।

शायद उसने अपनी तीन इच्छाओं पर ज़्यादा ध्यान से सोच विचार नहीं किया था, दीख रहा था कि प्यारी सी सुन्दर सी नेहा के दिमाग के घोड़े दौड़ रहे थे लेकिन वो कुछ भी दलील दे न पाई और कुछ देर क पशोपेश के बाद सिर हिला के मान गई कि जो मैं कह रहा था वो सही है।

नेहा ने सीन समझाया- देखो निलेश… मैं गाँव की एक जवान लड़की हूँ जो सुबह सुबह कुएँ पर नहा कर घर लौट रही है और तुम एक लफंगे लड़के हो… तुम बहुत दिनों से मेरे पीछे पड़े हो और इस ताक में हो कि कब तुम मुझे पकड़ने का मौका पा सको… आज तुमको लगा तुम अपनी मर्ज़ी कर सकते हो… अब इसके आगे तुम खुद सीन सोचो और मेरा बलात्कार करो।

नेहा इसके बाद बाथरुम में चली गई।

दो मिनट के बाद बाहर निकली तो उसने सिर्फ एक तौलिया अपने बदन पर लपेट रखा था। उसकी मतवाली जवानी तौलिये से उफन उफन कर बाहर निकली जा रही थी। उसे देख कर किस का दिल नहीं करेगा कि उसे वहीं के वहीं चोद डाले।

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वह इतराती हुई, इठलाती हुई धीमे धीमे छोटे छोटे पग रखती हुई मेरी तरफ को आ रही थी।
मैं बोला- , कहाँ चुपके चुपके चली जा रही हो… तेरे आशिक यहाँ मरे जा रहे हैं… एक नज़र इधर भी तो डाल दे।
इतना कह कर मैं अपना अकड़ा हुआ लौड़ा सहलाने लगा।

नेहा ने गुस्से में आँखें तरेर कर डांटा- सुन जीतू के बच्चे… तू मेरा पीछा छोड़ेगा या नहीं? अपनी शकल देख ज़रा शीशे में। एकदम लंगूर लगता है… दूर हट… नहीं तो चप्पल निकाल के मारूँगी… हां !
तो इस खेल में मेरा नाम जीतू था!

‘हाँ हाँ मेरी झाँसी की … ज़रूर मार… यहाँ तो तैयार बैठे हैं तुझ से मार खाने को… मार जितना मर्ज़ी लेकिन आज तो तेरी चूत मैंने लेनी ही लेनी है… अब चाहे हंस के चुदवा, चाहे रो के!

इतना कह के मैंने नेहा की बांह पकड़ ली और उसे अपनी तरफ खींचना चाहा।

नेहा ने पूरी ताक़त से दूसरे हाथ से मेरे मुँह पर मुक्का मारने की कोशिश की।

मैंने उसका फूल जैसा नाज़ुक हाथ पकड़ लिया और ज़ोर से आलिंगन में बाँध लिया।

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नेहा पूरा ज़ोर लगा रही थी मुझ से छूटने के लिये।

नेहा जैसी कमसिन और नाज़ुक लड़की चाहे जितनी ताकत लगा ले किसी आदमी की पकड़ से छूटना मुश्किल है।

फिल्मों में ज़रूर लड़की अपना हाथ छुड़ा के मीलों भागती हैं दुबारा विलेन के चंगुल में आने से पहले।

खैर नेहा ज़ोर लगाती रही परन्तु छूट ना सकी।

मैंने उसके होंठ चूमने चाहे लेकिन वह अपना मुँह इधर उधर हिला हिला कर बचती रही और कहती रही- जीतू छोड़ दे, छोड़ दे, छोड़ दे।

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