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गुलाब जामुन सी रसीली उसकी चुत-1

प्रिय पाठक और पाठिकाओं को मेरा नमस्कार।

नेहा की कहानी के बाद एक नय़ी और पठे एक लड़की है मनोरमा, जो विवाहित है, रामनगर में रहती है। वो अपने यौन जीवन से यूँ तो संतुष्ट है लेकिन चाहती है कि मेरे साथ लंड, चूत, चुदाई की बातें करे !

मनोरमा ने तीन चार दिन खूब चैटिंग की, उसमें मनोरमा इतनी गर्म हो जाती थी कि जिसका कोई हिसाब नहीं। आम तौर पर वो रात 10 बजे चैटिंग के लिये आती थी जब उसका पति उसे चोद कर सो जाता था।
वो नंगी ही चैटिंग करती थी, गर्म होकर मनोरमा चुदाई हो जाने के बावजूद चूत में उंगली दे देकर अपनी गर्मी कम करती थी।

कुछ दिन इसी प्रकार सिलसिला चलता रहा, फिर उसने कहा कि उसका बहुत मन है कि अपने पति के अलावा भी और लौड़ों का स्वाद चखे।

मैंने कहा- मेरी जान मनोरमा , बताओ मैं कब तुम्हारी सेवा में रामनगर हाज़िर हो जाऊँ? तुमसे बात करते करते मैं भी बहुत बेकरार हूँ तुम्हें चूमने चाटने और चोदने को, हाँ, तुम्हारा स्वर्ण रस भी तो मुझे चखना है।
मनोरमा ने कहा- नहीं… रामनगर तो छोटा शहर है, यहाँ तो दिक्कत होगी, कोई ना कोई जान पहचान का ज़रूर देख लेगा।
मैं बोला- तो मेरी मिशरी की डली, मनोरमा बताओ कैसे करें? तुम जैसा कहो मैं तैयार हूँ।

कुछ देर तक मनोरमा चुप रही, यहाँ तक कि मुझे लगा वो लाइन से चली गई है, फिर उसका उत्तर आया- सुनो निलेश… हमारे पति को चार दिन के लिये मुंबई जाना है काम से, 5 से लेकर 8 तारीख तक, हम उनको मनाते हैं कि हमें भी साथ ले चलें, वो तो अपने काम में बिज़ी हो जाएँगे और हम दोनों ऐश करेंगे पूरे चार दिन, 5 सितंबर को मेरा जनमदिन भी है, हम अपना जन्मदिन अपने निलेश से चुदवा कर मनायेंगे। क्या कहते हो?

मैंने कहा- प्रोग्राम तो सही है लेकिन पहले अपने पति को तो पटाओ !
मनोरमा ने कहा कि वो ज़रूर पटा लेगी, जब वो उसका लंड चूसती है तो उस समय जो चाहे वो बात मनवा लेती है।
जैसा मनोरमा ने कहा था, वैसा ही हुआ, लंड चुसवाते हुए उसका पति थोड़ी बहुत ना नकुर करने के बाद बिल्लो को साथ मुंबई ले चलने कोनिलेश़ी हो गया।
यार यह अच्छा तरीका है लड़कियों का !!! लौड़ा चूसते हुए आदमी से जो भी मांगो, मिल जाता है।
यह बात अगस्त की 31 है,  आप यह कहानी अन्तर्वासना स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है | हम दोनों ही बड़ी बेसबरी से 5 सितंबर का इंतज़ार कर रहे थे। चैटिंग पर एक एक घंटा चूत चुदाई की बातें करते थे, बुरी तरह से गर्म हो जाते थे।

मनोरमा ने एक रात अपने पति को सोते से जगाकर दुबारा से चोदने को कहा। कह रही थी कि उसका पति बहुत खुश हुआ कि पहली बार उसकी बीवी ने खुद आगे बढ़कर चुदने की फरमाइश क़ी।
मुझे कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि मैं अपनी बीवी को चैटिंग के बाद ही चोदता था। हाँ यह ज़रूर हुआ कि मैं मस्ती में चूर उसे बड़े धमाके से चोदता जैसे कि बहुत दिनों के अंतराल के बाद चुदाई मिली हो।

खैर यारो, राम राम करते हुए आखिरकार वो दिन आ ही गया जिसे विधि ने हमारे संगम के लिये तय कर रखा था।
मैंने बिल्लो से पूछ लिया था कि वो लोग किस होटल में रुकेंगे, मैंने भी उसी होटल लेमन ट्री में एक रूम अपने लिये बुक करवा लिया।
4 सितंबर को सुबह साढ़े दस बजे मैंने होटल जाकर अपना रूम ले लिया। मेरा रूम था नंबर 312 जबकि उन लोग का रूम था 208. मैंने तुरंत ही मनोरमा को अपना कमरा नंबर SMS कर दिया।
11 बजे के करीब मेरे रूम के दरवाज़े पर खटखट हुई, खोला तो मेरी मनोरमा साक्षात मेरे सामने खड़ी थी।

मैंने पूछा- मनोरमा ?
उसने पूछा- निलेश जी?
दोनों ने सिर हिलाया और फिर वो जल्दी से कमरे के भीतर आ गई, झट से मैंने दरवाज़ा बंद कर के अंदर से लॉक कर दिया।
फिर मैंने उसे और उसने मुझे अच्छे से निहारा, मनोरमा एक बहुत ही सुन्दर डिज़ाइनर साड़ी पहने थी जिसका गहरे नीले बेस पर सुनहरे और हरे रंग का बहुत सुन्दर डिज़ाइन प्रिंट था, ब्लाऊज़ भी मैचिंग रंग का था, उसके बाल एक चोटी में बंधे थे, गले में एक हीरों का हार और उसी से मैचिंग कानों के बुंदे, साड़ी नाभि के नीचे बांध रखी थी।

खुला हुआ गोरा सा चिकना सा पेट देख कर मेरी सांस रुक सी गई और लौड़ा पैंट के भीतर फुनफुनाने लगा, बहुत सेक्सी पेट था मेरी मनोरमा का !
वो एक साड़ी के इश्तहार की मॉडल लग रही थी।
बहुत ही खूबसूरत चेहरा, बड़ी सुडौल गर्दन, तीखे नैन नक्श !!!
खूबसूरती की एक जीती जागती प्रतिमा थी यह मनोरमा …
आज उसका जनमदिन था तो शायद नये कपड़े पहन के आई थी। कितना मज़ा आयेगा जब ये नये नये कपड़े उतार के मैं उसे चोद कर जन्मदिन का तोहफा दूंगा, यह सोच सोच कर ही मेरी उत्तेजना बढ़ने लगी।मैंने उसके पीछे की तरफ जाकर देखा कि मनोरमा का ब्लाऊज़ बहुत ही लो कट था और उसकी पीठ लगभग पूरी ही नंगी थी। माशा अल्लाह, गोरी रेशमी पीठ… वल्लाह, साले चूतनिवास, आज तो तेरे मज़े लगने वाले हैं !

मनोरमा के हाथ मुलायम और खूबसूरत थे, नाखून बहुत अच्छे से, सलीके से तराशे हुए, उन पर बैंगनी रंग की नेल पोलिश, उसी रंग की नेल पोलिश पैरों के नाखूनों पर भी थी। पैर भी बेहद खूबसूरत थे, शायद पेडिक्योर करवा के आई थी, साफ सुन्दर सुडौल उंगलियाँ !!!

मैं मनोरमा के पास गया और उसे बिस्तर पर बिठा दिया, मैंने कहा- सुनो मनोरमा , तुम अपनी साड़ी और ब्लाऊज़ उतार दो, नहीं तो हमारे इक्का दुक्की के खेल में नये कपड़े मुसमुसा जायेंगे।
मनोरमा बोली- हाँ निलेश, हम भी यही सोच रहे थे, हम बाथरूम में जाकर कपड़े उतार देते हैं और तुम्हारी कहानी की नीलम की भांति हम तौलिये में अपने को लपेट कर आयेंगे। क्यों ठीक है?
मैंने कहा- हाँ मनोरमा , मेरी जान, बिल्कुल सही है।

‘हम बस गये और आये…’ कह कर मनोरमा बाथरूम में घुस गई।
मैंने अपने कपड़े भी उतार दिये और एक लुंगी लपेट ली। मैंने लुंगी को बांधा नहीं, बल्कि यूं ही लपेट लिया कमर में और मनोरमा के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगा।
बस दो चार मिनट में बाथरूम का दरवाज़ा खुला और होटल के झक सफेद तौलिये में लिपटी हुई मनोरमा सकुचाते हुए, शरमाते हुए, निगाह फर्श पर गड़ाये बाहर निकाली और बड़ी नज़ाकत से छोटे छोटे कदम रखते हुए मेरी ओर बढ़ने लगी।
उसका चेहरा शर्म से लाल हुए जा रहा था।
मैं उठा और उसकी तरफ लपका तो मेरी लिपटी हुई लूंगी खुल कर गिर गई और मैं पूरा नंगा हो गया।
मुझे नग्*न देखते ही मनोरमा ने हाथ उठाकर आँखों पर ढक कर आँखें बंद कर लीं लेकिन जैसे ही हाथ उठाये तो उसका तौलिया भी झट से गिर पड़ा।
अब मनोरमा भी पूरी नंगी थी और शर्म से जहाँ तक पहुँची थी वहीं की वहीं अटक गई और घूम कर मेरी तरफ पीठ कर ली। मैं उठा और उसकी तरफ लपका तो मेरी लिपटी हुई लूंगी खुल कर गिर गई और मैं पूरा नंगा हो गया।
मुझे नग्*न देखते ही मनोरमा ने हाथ उठाकर आँखों पर ढक कर आँखें बंद कर लीं लेकिन जैसे ही हाथ उठाये तो उसका तौलिया भी झट से गिर पड़ा।
अब मनोरमा भी पूरी नंगी थी और शर्म से जहाँ तक पहुँची थी वहीं की वहीं अटक गई और घूम कर मेरी तरफ पीठ कर ली।
मेरी नज़र मनोरमा के मदमस्त नितम्बों पर अटक गई। भगवान की सौगंध बहुत ही ज्यादा आकर्षक चूतड़ थे हरामज़ादी के… गोल गोल सलोने सुन्दर और मनलुभावने।

दिल करता था कि बस जीवन भर इन्हें देखे ही जाओ और चूमे-चाटे ही जाओ।
फिर मेरी निगाह मुश्किल से नीचे उतरी और फिर अटक गई मनोरमा की हद से अधिक खूबसूरत टाँगों पर।
यार यह लड़की तो ऐसी थी कि हर अंग पर नज़र अटकी जाये, अटकी ही जाये।
तभी मेरे ध्यान में मनोरमा के चूचुक आये जिन पर मेरी एक उड़ती उड़ती सी नज़र पड़ी थी मनोरमा के पलटने से पहले।

लपक कर मैं अपनी प्यारी सी मनोरमा के सामने जा खड़ा हुआ फिर से उन चूचियों को निहारने लगा।
यारो, मेरे दिल धड़कन जैसे थम गई, साँसें तेज़ हो गई, और कानों में शाँय शाँय धांय धांय की आवाज़ें आने लगीं।

उस बला की हसीन मनोरमा ने मुझे एक तेज़ बिजली का करंट सा दे दिया था… चूचियाँ थीं या क़यामत !
बहुत ज़्यादा मोटी नहीं थीं, मेरे अंदाज़ से 34 D की ब्रा उसे फिट आती होगी, हल्के भूरे रंग के छोटे छोटे निप्पल जो पुकार पुकार के चुस जाने और मसले जाने को बेताब दिखाई पडते थे।

इतनी हसीन चूचों का होना असम्भव सा लगता था परन्तु यह सत्य था मेरी आँखों के सामने…
मनोरमा तो खूबसूरती के एक जीती जागती तस्वीर थी। उसका हुस्न हर मर्द के स्वप्नों का साकार रूप था। मेनका या उर्वशी या रति, इनमें से कोई भी अप्सरा शायद मेरी जान बिल्लो से बढ़ कर ना होगी।
यह वह मादक सौन्दर्य था जिसे देख कर बड़े बड़े ऋषि, मुनियों और अवतारों की तपस्या भंग हो जाती। इसे देखकर शरीफ से शरीफ मर्दों में खून खच्चर हो जाये।

कहानी जारी है ….. आगे की कहानी पढने के लिए निचे लिखे पेज नंबर पर क्लिक करे …..

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