दोस्ती का फर्ज अदा किया-14

फिर मैं अपने आपको सम्हालते हुए अपनी जेब में हाथ डालकर लौड़े को सही करने लगा.. क्योंकि उस समय मैंने सिर्फ लोअर ही पहन रखा था। मैं जल्दबाज़ी में चड्डी पहनना ही भूल गया था..

तभी मैंने अपने लण्ड को एडजस्ट करते हुए ज्यों ही रूचि की ओर देखा.. तो उसके भी चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान छा चुकी थी.. शायद उसने भी मेरे उभार को महसूस कर लिया था।

मैंने भी उसी समय उससे पूछा- क्या हुआ.. तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो?

तो वो बोली- आपको क्या.. आप तो आराम से सोने चले गए.. पर मुझे भाई ने अभी तक काम पर लगाए रखा है.. हद होती है किसी चीज़ की.. पहले अलमारी सही कराई.. मैंने कर दी.. अब इतनी रात को बोल रहा है कि चलो ये कपड़े भी धोओ.. तो मैं बिना कुछ कहे कपड़े मशीन में डालने लगी.. तो बोला मशीन से नहीं.. हाथ से धोओ.. ये भी कोई बात हुई क्या.?

तो मैंने भी बोला- हाँ.. कह तो सही रही हो.. मैं विनोद को समझाता हूँ। तब तक माया भी वहाँ नाईटी में आ गई.. और मामले को रूचि से समझने लगी।

मैं विनोद के पास बैठकर उसे समझाने में लगा हुआ था कि यार ऐसा न कर.. माना कि हम जीते हैं.. पर है तो वो तेरी बहन ही न.. आराम से काम ले.. जितना आज हो सके उससे.. आज करा.. बाकी कल छोड़कर परसों फिर से करा लियो.. अभी बहुत समय है.. क्यों इतना जल्दिया रहा है.. और वो तो कर भी रही है.. तो उसे अपने हिसाब से करने दे।
विनोद बोला- हाँ यार.. गलती मेरी ही है.. कुछ ज्यादा ही हो गया था शायद.. चल अब नहीं होगा।
तब तक माया भी आई और विनोद से कुछ कहती.. इसके पहले ही मैंने बोला- आंटी.. अब जाने दो.. जो हुआ सो हुआ.. अब कुछ नहीं होगा.. मैंने समझा दिया है।
तो रूचि बोली- अबकी ऐसा हुआ न.. तो मुझे विनोद भाई के साथ नहीं रहना..
मैंने भी बात को सम्हालने के लिए हँसते हुए रूचि से बोला- ओह्हओ.. झाँसी की रानी.. अब ज्यादा न भाव खा.. मैंने उसे समझा दिया है.. अब तंग नहीं करेगा.. जा और जाकर सो जा..
तो वो बोली- अब आप कह रहे हो.. तो कोई नहीं.. पर इससे बोल दियो कि आगे से मैं अपने हिसाब से ही काम करूँगी।
मैंने बोला- ठीक है.. जाओ अब.. तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.. तुम सो जाओ।
तो वो बोली- ठीक है..
मैं और माया भी कमरे से निकलने लगे।
मैं तो सीधा कमरे में जा कर लेट गया.. पर माया शायद फिर से दरवाज़े के बाहर खड़े हो कर दोनों को समझाने में लगी हुई थी। दोस्तों आप यह कहानी अन्तर्वासना स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है |
अब उसे समझाने दो.. तब तक मैं आपको बताता हूँ कि रूचि में ऐसा मैंने क्या देख लिया था.. जो मेरा लौड़ा फिर से चौड़ा होने लगा था। तो आपको बता दूँ जैसे दरवाज़ा खुला.. तो मेरी पहली नज़र रूचि की जाँघों पर पड़ी.. जो कि चुस्त लैगीज से ढकी थी.. उसकी दूधिया जाँघें उसमें से साफ़ झलक रही थीं और जब मेरी नज़र उसके योनि की तरफ पहुंची तो मैं देखता ही रह गया.. उसने आज नीचे चड्डी नहीं पहने हुई थी। जिससे उसकी चूत भी फूली हुई एकदम गुजिया जैसी साफ़ झलक रही थी।
मैं तो देखते ही खुद पर से कंट्रोल खो बैठा था.. अगर शायद उस वक़्त विनोद वहाँ न होता तो मैं उसकी गुजिया का सारा मीठापन चूस जाता। फिर जब मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो वो किसी परी की तरह नज़र आ रही थी। उसके बाल पोनी टेल की तरह बंधे हुए थे और बालों की लेज़र कट उसे खूबसूरत बना रही थी। उसके होंठ भी गजब के लग रहे थे.. मेरा तो जी कर रहा था कि मैं इनका रस अभी चूस लूँ.. मसल के रख दूँ उसकी अल्हड जवानी को।
पर मैं दोस्त के रहते ऐसा कर न सका। हाँ.. इतना जरूर हुआ कि वो भी मेरी चक्षु-चुदाई से बच न सकी.. आँखों ही आँखों में मैंने उसे अपने अन्दर चल रहे उफान को जाहिर कर दिया था.. जिसे रूचि ने मेरे अकड़ते लंड को देखकर जान लिया था। उसकी मुस्कराहट उस पर मोहर का काम कर गई थी।
उस समय उसके चूचे तो क़यामत लग रहे थे। वो टी-शर्ट तो नहीं.. पर हाँ उसके जैसा ही ट्यूनिक जैसा कुछ पहना हुआ था.. जिसमें उसकी चूचियों का उभार आसमान छूने को मचल रहा था। उसकी इस भरी जवानी का मैं कायल सा हो गया था और इन्हीं बातों को सोचते-सोचते मेरी आँखें बंद हो चली थीं।
मेरा हाथ मेरे सामान को सहला रहा था कि तभी माया आंटी अन्दर आईं और ‘धम्म’ से दरवाज़ा बंद किया।
इसी के साथ में स्वप्न की दुनिया से बाहर आया।
अब आगे क्या हुआ यह जानने के लिए उसके वर्णन के लिए अपने लौड़े को थाम कर कहानी के अगले भाग का इंतज़ार कीजिएगा।
तब तक के लिए आप सभी को राहुल की ओर से गीला अभिनन्दन।

दोस्तों मजा लेते रहिये और आगे की कहानी अगले भाग में तब तक के धन्यवाद मेरे गुरु जी के मेल पर आप मेल कर के बता सकते है आप लोगो को ये कहानी कैसी लगी Email: [email protected]

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