दोस्ती का फर्ज अदा किया-13

गतांग से आगे …..
फिर तो विनोद खिसियाते हुए बोला- अबे लेक्चर बंद कर.. और लेकर आ.. तब जानूँ..
तो मैं उठा और रसोई में गया.. जहां पहले से ही सब रेडी हो चुका था.. बस बाहर आने की ही देरी थी।
मैं जैसे ही गया तो रूचि बोली- क्या है.. क्या बात कहनी थी?
तो मैं बोला- कैसे भी करो.. हारो.. नहीं तो प्लान चौपट हो सकता है.. विनोद की वजह से.. कहीं वो शर्त से मुकर गया.. तो सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा।
तो वो मेरे और करीब आई और मुस्कुराते हुए मुझे बाँहों में भरकर मेरे होंठों पर चुम्बन देते हुए बोली- जान तेरे लिए तो अब मैं अपना सब कुछ हारने को तैयार हूँ.. फिर ये गेम क्या चीज़ है।
मैंने भी उसके बोबों को भींचते हुए बोला- तो फिर अब चलें..

मेरे अचानक से हुए इस वार से या शायद ज्यादा ही दबाव के कारण.. उसके मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई..
तो मैं भी उतनी ही तेज स्वर में बोला- क्या यार.. बच्चों की तरह एक चूहे से डर गई..
यह कहते हुए हम वापस कमरे में पहुंच गए.. जहाँ हम खेल रहे थे।
आंटी रूचि से बोलीं- क्या हुआ.. चीखी क्यों थी?
तो रूचि मुस्कुरा उठी.. इसके पहले कि कोई अपना दिमाग लगाता.. मैंने बोल दिया- क्या आंटी.. रूचि तो बहुत ही डरती है.. जरा सा चूहा पैर से छू कर क्या निकल गया.. ये तो चीख ही पड़ी.. बहुत कमजोर है।
यह कहते हुए मैंने रूचि को देखते हुए आँख मार दी.. जिससे रूचि से रहा न गया और वो शर्मा उठी।
फिर मैंने बोला- ये तो कहो.. चूहे का दिल मजबूत था.. नहीं तो इसकी चीख सुनकर बेचारा वहीं मर जाता।
इतना सुनते ही सब ठहाके लगाकर हँसने लगे।
तभी विनोद रूचि से बोला- अब सबको ड्रिंक्स देगी भी.. या ऐसे ही खड़ी रहेगी..
तो रूचि बोली- थोड़ा तो रुको.. मैं बहुत घबड़ा गई थी। ये तो कहो.. मैं अकेली नहीं थी.. वरना सब गिलास टूट जाते और कांच भी साफ़ करना पड़ता..
फिर वो गिलासों में कोल्डड्रिंक्स डालने लगी और चारों गिलास में भरने के बाद ट्रे हमारी ओर बढ़ाई तो हम लोगों ने ली.. फिर एक उसने माया को दिया और एक खुद ले कर माया आंटी के पास बैठ गई।
तो दोस्तो, आप लोगों ने शायद ध्यान नहीं दिया कि जब से मैंने रूचि को जवानी का पाठ पढ़ाना शुरू किया था.. तब से वो न ही तो मेरा नाम ले रही थी और न ही मुझे अभी तक एक बार भी भैया बोला था।
खैर.. आपको कहानी पर ले चलते हैं.. फिर मैंने उससे बोला- चलो अब ‘ह’ से गो या ‘ह’ से हारी पाओ..
तो वो बोली- अच्छा..
और कुछ सोचने के बाद बोली- माँ मेरी डिक्शनरी लगभग खाली हो रही है.. कुछ आप भी गाओ न..?
तो माया बोली- मुझे जो आते हैं.. मैं गा तो रही हूँ..
और इसी तरह सोचने के कुछ देर बाद बोली- लो फिर… ‘हम तुमसे मोहब्बत करके दिन रात सनम रोते हैं।’
वो ऐसे चेहरे के भाव बना कर गा रही थी.. जैसे कि गाने के जरिये ही मुझे हाल-ए-दिल बयान कर रही हो।
मैं अभी इसी सोच में था कि अचानक विनोद की आवाज़ मेरे कान में पड़ी- देखा साले.. हरा दिया न..
तो मैं बोला- अभी कहाँ..
बोला- तू सोचता ही रहेगा या ‘ह’ से गाएगा भी?
तो मैं बोला- बाबू.. थोड़ा समय तो दे.. बस अभी गाता हूँ।
तभी रूचि बोली- इतनी देर का नहीं चलेगा..
तो मैं बोला- फिर आगे के लिए एक मिनट का समय तय कर लो.. मुझे ऐसा लग ही रहा था कि अब खेल ख़त्म होने की तरफ है.. क्योंकि मुझे गाना ही ऐसा याद आया था.. जिससे शायद उसे उसके गाने का जवाब भी मिल जाता।
तो मैंने गाना शुरू करने के पहले विनोद से बोला- तुम साले.. बस टापने के लिए ही बैठे हो.. या कुछ करोगे भी..?
वो बोला- मैं तुम्हारे ही सहारे खेल रहा हूँ.. तुम्हें तो पता ही है कि ये मेरे बस के बाहर है।
फिर मैंने बोला- चलो.. अब खेल ख़त्म..
रूचि ने सोचा कि मैं हार गया.. वो ख़ुशी से उछल पड़ी… तो मैं बोला- अरे इतनी खुश न हो..
तो वो बोली- आपको हराकर में खुश न हुई.. तो क्या हुआ.. वैसे आज विनोद भैया को गुलाम बनाना है.. ये मुझसे अक्सर बहुत काम लेते हैं।
मैं बोला- परेशान न हो.. मैं ये कह रहा था कि मेरे गाने के बाद खेल ख़त्म हो जाएगा..
मैंने एक आँख मार कर इशारा भी कर दिया ताकि आंटी को भी शक न हो कि मैं और रूचि भी उन्हीं क़े जैसे मिले हुए हैं।
तो रूचि बोली- कैसे?
मैं बोला- खुद ही देख लेना..
मैंने गाना चालू किया- हाल क्या है दिलों का.. न पूछो सनम.. आप का मुस्कुराना गजब ढा गया। एक तो महफ़िल तुम्हारी हंसी कम न थी.. उस पे मेरा तराना गजब ढा गया। हाल क्या है..?
अब चलो.. गाओ ‘है’ से..
थोड़ी देर बाद विनोद बोला- रूचि अभी कुछ देर पहले एक मिनट वाला शायद कुछ कह रही थी न..
ये कहते हुए वो हँसने लगा और मन ही मन हम तीनों भी ये सोच कर हंस रहे थे कि विनोद भी बेवकूफ बनकर खुद ही मदद करने लगा और वो गिनती गिनते हुए रूचि से बोले जा रहा था- अगर तू फंस गई.. तो समझ ले बहुत सारे कपड़े तुझसे धुलाऊँगा.. बहुत दिनों से गंदे पड़े हैं और तू खुद ही जिम्मेदार भी है.. अभी खुद पर बड़ा टशन था न.. अभी हारते ही सबसे पहले तुझे मैं मुर्गा बनाता हूँ।
विनोद की इस बात से आंटी इतना खुश हो रही थीं.. कि कुछ पूछो ही नहीं.. क्योंकि अब कुछ ऐसा बचा ही नहीं था कि विनोद किसी तरह का कोई विरोध करे या बनाए गए प्लान में आपत्ति जताता। उन्होंने मेरी और मुस्कुराते हुए देखकर फेसबुक की लाइक बटन की तरह अपने हाथों से इशारा किया.. जिससे मुझे लगा कि जैसे आज मेरी इच्छा नहीं बल्कि आंटी की इच्छा पूरी होने वाली है। दोस्तों आप यह कहानी अन्तर्वासना स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है | वैसे दोस्तो, आप सभी को मेरा प्लान कैसा लगा?

कहानी जारी है ….. आगे की कहानी पढने के लिए निचे लिखे पेज नंबर पर क्लिक करे …..

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